
रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया दो धड़ों में बंटी हुई है। एक धड़ा रूस के खिलाफ और पश्चिमी देशों के साथ है तो दूसरा धड़ा रूस और उसके समर्थकों के साथ है। इस तरह से विश्व को मौजूदा स्वरूप भी बदला हुआ है। इस बदले हुए स्वरूप में राजनीतिक और रणनीतिक बदलाव भी शामिल है। अमेरिका और रूस दोनों ही अपने समर्थकों की सूची को बढ़ाने में लगे हुए हैं। रूस की ही यदि बात करें तो उसने अपने ग्रुप में चीन, ईरान, उत्तर कोरिया, तुर्की, म्यांमार, के बाद अब अफगानिस्तान को भी जोड़ लिया है।
अफगानिस्तान इसमें सबसे नया सदस्य है जबकि म्यांमार की एंट्री इसमें सितंबर की शुरुआत में उस वक्त हुई थी जब वहां के सैन्य शासन के प्रमुख मिन आंग ह्लिंग रूस के दौरे पर गए थे। कुल मिलाकर इन देशों के साथ रूस की जो खिचड़ी पक रही है उस पर अमेरिका और यूरोपीय देशों की पूरी नजर है। रूस के साथ आने वाले देशों की ही यदि बात करें तो इनकी स्थिति काफी कुछ समान दिखाई देती है।
रूस के साथ आने वाले देशों में शामिल चीन, जो विश्व की एक बड़ी अर्थव्यवस्था भी है उसके अमेरिका के साथ संबंध सबसे निचले दौर में हैं। चीन भी रूस की ही तरह अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। वहीं उत्तर कोरिया जिसको रूस ने पिछले दिनों रणनीतिक मदद देने की भी बात की थी, उसकी भी यही स्थिति है। उत्तर कोरिया चीन का बेहद करीबी है और अमेरिकी प्रतिबंधों की मार झेल रहा है। ये एक ऐसा देश है जिसको इसके पड़ोसी देशों के अलावा दूसरे देश भी चिढ़ते हैं और अपने लिए खतरा मानते हैं। रूस और चीन की तरह ये भी अमेरिका का घुर विरोधी देश है।